पद और प्रतिष्ठा से ऊपर बचपन की दोस्ती, जिला कलक्टर आईएएस अरुण कुमार हसीजा ने पेश की आत्मीयता की मिसाल

हिंदुस्तान जिंक से सेवानिवृत्त हुए बचपन के मित्र गिरीश अड़ानिया के विदाई समारोह में पहुंचे जिला कलक्टर, स्वयं वाहन चलाकर घर तक छोड़ा

राजसमन्द। मित्रता का संबंध पद, प्रतिष्ठा और सामाजिक हैसियत से कहीं ऊपर होता है। इसकी एक भावपूर्ण मिसाल उस समय देखने को मिली, जब राजसमन्द जिला कलक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट अरुण कुमार हसीजा अपने बचपन के मित्र गिरीश अड़ानिया के सेवानिवृत्ति समारोह में शामिल होने पहुंचे। इतना ही नहीं, समारोह के उपरांत जिला कलक्टर ने स्वयं वाहन चलाकर अपने मित्र को उनके घर तक पहुंचाया। उनकी इस आत्मीय पहल ने समारोह में उपस्थित अधिकारियों, कर्मचारियों और श्रमिकों को भावविभोर कर दिया।

जिला कलक्टर अरुण कुमार हसीजा और हिंदुस्तान जिंक में फोरमैन के पद पर कार्यरत रहे गिरीश अड़ानिया की मित्रता बचपन से है। दोनों मूलतः चित्तौड़गढ़ से हैं तथा विद्यालय से लेकर स्नातक स्तर तक साथ अध्ययन किया। शिक्षा पूर्ण होने के बाद दोनों ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपना करियर बनाया। हसीजा ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा तक का सफर तय किया और वर्तमान में राजसमन्द जिला कलक्टर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। वहीं, अड़ानिया ने हिंदुस्तान जिंक में फोरमैन के रूप में लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं।

हिंदुस्तान जिंक के यूनियन भवन में गिरीश अड़ानिया की सेवानिवृत्ति के अवसर पर विदाई समारोह आयोजित किया गया था। समारोह में उनके सहकर्मी, श्रमिक प्रतिनिधि एवं प्रबंधन से जुड़े अधिकारी उपस्थित थे। इसी दौरान जिला कलक्टर अरुण कुमार हसीजा अपने व्यस्त प्रशासनिक कार्यक्रमों के बीच समय निकालकर मित्र के विदाई समारोह में पहुंचे। उन्होंने गिरीश अड़ानिया से आत्मीय मुलाकात की और उन्हें सेवानिवृत्ति पर शुभकामनाएं दीं।

समारोह में जिला कलक्टर की उपस्थिति ने सभी को प्रभावित किया। प्रशासनिक दायित्वों और उच्च पद की व्यस्तताओं के बावजूद बचपन के मित्र के महत्वपूर्ण अवसर पर उनकी सहभागिता ने मित्रता और मानवीय संबंधों के प्रति उनके सम्मान को प्रदर्शित किया। उपस्थित कर्मचारियों एवं श्रमिकों ने भी इस आत्मीयता की सराहना की।

समारोह के समापन पर एक और भावपूर्ण दृश्य देखने को मिला। जब गिरीश अड़ानिया अपने घर के लिए रवाना होने लगे, तो जिला कलक्टर हसीजा ने स्वयं उन्हें घर छोड़ने की पहल की। उन्होंने अपने निजी वाहन की ड्राइविंग सीट संभाली और मित्र को साथ बैठाकर उनके निवास तक पहुंचाया। इस सहज व्यवहार ने उपस्थित लोगों को विशेष रूप से प्रभावित किया।

जिला कलक्टर की इस पहल ने यह संदेश दिया कि जीवन में उपलब्धियां और पद कितने भी बड़े क्यों न हों, सच्चे रिश्तों का महत्व सदैव बना रहता है। बचपन से चली आ रही इस मित्रता ने वर्षों के अंतराल, अलग-अलग कार्यक्षेत्रों और जिम्मेदारियों के बावजूद अपनी आत्मीयता बनाए रखी है।

यह प्रसंग न केवल मित्रता की गहराई को दर्शाता है, बल्कि सार्वजनिक जीवन में सादगी, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का भी प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है।